13 years ago
Thursday, November 27, 2008
दो लड़कियां
चीड़ के पेड़ से पीठ टिकाए,
कॉलेज् जाने वाली लड़की,
फुट पाथ पर बैठी,
मैंहदी लगाने वाली,
राजस्थानी बालिका वधू की,
रंग बिरंगी पोशाक को
टकटकी लगाए देख रही है।
कॉलेज जाने वाली लड़की की
दाँईं बाज़ू में सिमटी किताबें.......
हथेली पर,
अभी-अभी लगवाई,
गीली- हरी मैंहदी..... दोनो हाथों में, दो-दो सुनहरे सपने।
मेंहदी लगाने वाली लड़की,
कॉलेज जाने वाली लड़की,
कॉलेज जाने वाली लड़की की,
हल्के रंग की पोशाक
और बाहों में सिमटी किताबों को,
रह-रह कर, चाव से,
नज़र भर देख लेती.......
दोनों आंखों में भर कर
बड़े सपने.......
तब तक, जब तक,एक भारी हाथ से पड़ा घौल,
उसे, एक दूसरे हाथ पर मैंहंदी लगाने की
याद नहीं दिलाता।
Saturday, November 22, 2008
कविता
यूं ही नहीं मिल जाते हैं स्वप्न...........
कविता
ज़िन्दगी यूं ही
तोहफों से नहीं नवाज़ेगी,
हर मोड़
यूं ही नहीं मिल जाएंगे स्वप्न।
मायूसियों की चादर ओढ़,
ख़ुद पर दया करते,
क्या फेर पाओगे किस्मत का पहिया?
बेचारगी की चोगे में,
मिलेगा आसमान?
उठ!
घुटनों पर सिर रखने वाले,
और जी डाल संपूर्ण जीवन,
कण्टकों से भरा संपूर्ण जीवन।
कविता
ज़िन्दगी यूं ही
तोहफों से नहीं नवाज़ेगी,
हर मोड़
यूं ही नहीं मिल जाएंगे स्वप्न।
मायूसियों की चादर ओढ़,
ख़ुद पर दया करते,
क्या फेर पाओगे किस्मत का पहिया?
बेचारगी की चोगे में,
मिलेगा आसमान?
उठ!
घुटनों पर सिर रखने वाले,
और जी डाल संपूर्ण जीवन,
कण्टकों से भरा संपूर्ण जीवन।
Thursday, November 20, 2008
कविता......
तुम्हीं हार रहे हो.....
तुम्ही हार रहे हो।
मैं तो अभी भी हूं सशक्त।
विनम्र प्रार्थना को,
भीख बना देने की नीचता,
तुम्हीं ने की-
मैं तो अब भी,
तुम्हारे तिरस्कार को,
माफ कर पाने में हूं सक्षम।
आज भी कह रहा हूं तुम्हें,
सर्वसक्षम सर्वशक्तिमान
और, तुम्हीं झुठला रहे हो,
अपना ईश्वर होना।
मैने तब भी इंसान होकर लगाई थी गुहार,
और अब भी
इंसान होकर
स्वीकार कर ली है हार।
तुम्ही हार रहे हो।
मैं तो अभी भी हूं सशक्त।
विनम्र प्रार्थना को,
भीख बना देने की नीचता,
तुम्हीं ने की-
मैं तो अब भी,
तुम्हारे तिरस्कार को,
माफ कर पाने में हूं सक्षम।
आज भी कह रहा हूं तुम्हें,
सर्वसक्षम सर्वशक्तिमान
और, तुम्हीं झुठला रहे हो,
अपना ईश्वर होना।
मैने तब भी इंसान होकर लगाई थी गुहार,
और अब भी
इंसान होकर
स्वीकार कर ली है हार।
Wednesday, November 19, 2008
छिपकलियां
सफेद धुली दीवार पर
बैठी है छिपकली
घात लगाए
और
सफेद धुली पोशाकों में भी
कुछ छिपकलियां
घात लगाए,
मौकों की तालाश में......
.........सैंकड़ों पतंगे
हर दिन होते शहीद
शहीद हो जाती हैं
खुद भी ये छिपकलियां
क्योंकि
सफेद धुली पोशाकों में
घात लगाती
ये सिर्फ मौके तालाश करती हैं
पतंगों और छिपकलियों में
भेद नहीं रखती............
और
सफेद धुली दीवार पर बैठी
छिपकली से
अलग हो जाती है।
सफेद धुली दीवार पर
बैठी है छिपकली
घात लगाए
और
सफेद धुली पोशाकों में भी
कुछ छिपकलियां
घात लगाए,
मौकों की तालाश में......
.........सैंकड़ों पतंगे
हर दिन होते शहीद
शहीद हो जाती हैं
खुद भी ये छिपकलियां
क्योंकि
सफेद धुली पोशाकों में
घात लगाती
ये सिर्फ मौके तालाश करती हैं
पतंगों और छिपकलियों में
भेद नहीं रखती............
और
सफेद धुली दीवार पर बैठी
छिपकली से
अलग हो जाती है।
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